प्रतिबंधित सूची में दर्ज जमीनों की रजिस्ट्री पर हाईकोर्ट का निर्देश, सब-रजिस्ट्रार को लेकर भी स्थिति स्पष्ट
रांची: झारखंड में जमीन की खरीद-बिक्री और रजिस्ट्री से जुड़े मामलों में झारखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश दिया है। अदालत ने राज्य सरकार को नेशनल जेनरिक डॉक्यूमेंट रजिस्ट्रेशन सिस्टम (NGDRS) पोर्टल पर दर्ज प्रतिबंधित जमीनों की सूची तत्काल हटाने का निर्देश दिया है। साथ ही स्पष्ट किया है कि यदि किसी जमीन के दस्तावेज रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1908 और लागू नियमों के तहत निर्धारित शर्तें पूरी करते हैं, तो केवल प्रतिबंधित सूची में नाम दर्ज होने के आधार पर रजिस्ट्री से इनकार नहीं किया जा सकता।
जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग के सचिव को आदेश के अनुपालन के लिए सभी जिलों के उपायुक्तों को आवश्यक सर्कुलर जारी करने का निर्देश भी दिया है। इस फैसले से उन जमीन मालिकों को राहत मिलने की उम्मीद है, जिनकी जमीन पोर्टल पर प्रतिबंधित सूची में दर्ज होने के कारण रजिस्ट्री प्रक्रिया में बाधा का सामना कर रही थी।
NGDRS पोर्टल से प्रतिबंधित जमीनों की सूची हटाने का निर्देश
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को NGDRS पोर्टल पर दर्ज प्रतिबंधित जमीनों की सूची तत्काल हटाने को कहा है। अदालत के निर्देश का उद्देश्य राज्य के सभी जिलों में जमीन रजिस्ट्री की प्रक्रिया को निर्धारित कानूनी प्रावधानों के अनुरूप सुनिश्चित करना है।
इसके लिए राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग के सचिव को सभी उपायुक्तों तक आवश्यक निर्देश पहुंचाने होंगे। इससे जिला स्तर पर रजिस्ट्री कार्यालयों को भी अदालत के आदेश के अनुरूप कार्रवाई करने का निर्देश मिलेगा।
हजारीबाग के जमीन मालिक की याचिका से जुड़ा है मामला
यह मामला हजारीबाग जिले के निवासी अमित रंजन की याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने अपनी जमीन को प्रतिबंधित सूची से हटाने की मांग करते हुए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी।
याचिका के अनुसार, हजारीबाग जिले के बोंगा गांव में स्थित खाता संख्या 154 और प्लॉट संख्या 2606 की कुल 42 डिसमिल जमीन प्रतिबंधित सूची में दर्ज थी। इसके कारण जमीन की रजिस्ट्री कराने में परेशानी हो रही थी।
याचिकाकर्ता ने पहले प्रशासन के समक्ष भी इस समस्या को उठाया था। वहां से समाधान नहीं मिलने के बाद उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया। अदालत में मामले की सुनवाई के दौरान रजिस्ट्री अधिकारियों के अधिकारों और जमीन के मालिकाना हक से जुड़े सवाल भी सामने आए।
सब-रजिस्ट्रार का काम दस्तावेजों का निबंधन करना
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सब-रजिस्ट्रार का दायित्व दस्तावेजों का निबंधन करना है, न कि जमीन के मालिकाना हक का अंतिम निर्णय देना।
यदि जमीन से संबंधित दस्तावेज कानूनी और प्रक्रियागत शर्तें पूरी करते हैं तथा निर्धारित स्टांप शुल्क और रजिस्ट्रेशन फीस जमा कर दी गई है, तो केवल मालिकाना हक के विवाद का हवाला देकर रजिस्ट्री रोकना उचित नहीं है।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी जमीन की रजिस्ट्री हो जाने मात्र से खरीदार का मालिकाना हक अपने आप साबित नहीं हो जाता। यदि जमीन के स्वामित्व को लेकर वास्तविक विवाद या कानूनी कमी है, तो उसका समाधान संबंधित कानूनी प्रक्रिया के तहत ही किया जाएगा।
इसका अर्थ है कि रजिस्ट्री की प्रक्रिया और जमीन के वास्तविक मालिकाना हक का निर्धारण अलग-अलग कानूनी विषय हैं। इसलिए खरीदारों को रजिस्ट्री से पहले जमीन के दस्तावेजों और स्वामित्व की जांच करानी जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं लंबित, लेकिन अंतरिम रोक नहीं
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि इस मामले से जुड़े पूर्व के फैसलों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। इस संबंध में दो विशेष अनुमति याचिकाएं (SLP) लंबित हैं।
हालांकि, अदालत के समक्ष यह भी जानकारी रखी गई कि सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों में फिलहाल कोई अंतरिम रोक नहीं लगाई है। हाईकोर्ट ने इसी स्थिति को ध्यान में रखते हुए अपने आदेश के अनुपालन का निर्देश दिया।
जमीन की रजिस्ट्री कराने वालों पर क्या पड़ेगा असर?
हाईकोर्ट के आदेश से उन जमीन मालिकों को राहत मिलने की संभावना है, जिनकी जमीन केवल NGDRS पोर्टल की प्रतिबंधित सूची में दर्ज होने के कारण रजिस्ट्री नहीं हो पा रही थी।
अब निर्धारित कानूनी और प्रक्रियागत शर्तें पूरी होने पर रजिस्ट्री कार्यालयों को दस्तावेजों का नियमानुसार निबंधन करना होगा। इससे जमीन की खरीद-बिक्री से जुड़े मामलों में आ रही कुछ प्रशासनिक बाधाएं दूर हो सकती हैं।
हालांकि, इस आदेश को जमीन के स्वामित्व की स्वतः पुष्टि नहीं माना जाना चाहिए। जमीन खरीदने से पहले खरीदारों को खतियान, रजिस्टर-2, जमीन का रिकॉर्ड, स्वामित्व से जुड़े दस्तावेज और किसी संभावित कानूनी विवाद की जांच करानी चाहिए।
अब विभागीय सर्कुलर और पोर्टल से सूची हटाने की प्रक्रिया पर नजर
हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग और जिला प्रशासन की कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी। सभी जिलों के उपायुक्तों को निर्देश जारी करने और NGDRS पोर्टल से प्रतिबंधित जमीनों की सूची हटाने की प्रक्रिया पर आगे की स्थिति निर्भर करेगी।
अदालत के आदेश का वास्तविक प्रभाव तब स्पष्ट होगा, जब जिला स्तर के रजिस्ट्री कार्यालयों में इसका पालन शुरू होगा और प्रतिबंधित सूची के कारण लंबित रजिस्ट्री मामलों का नियमानुसार निपटारा हो सकेगा।
