दो निर्दलीय विधान पार्षदों के भाजपा में शामिल होने पर बिहार में सियासी विवाद, सदस्यता को लेकर कानूनी सवाल
बिहार की राजनीति में दो निर्दलीय विधान पार्षदों के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से जुड़ने के बाद नया विवाद खड़ा हो गया है। इस घटनाक्रम को लेकर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव बढ़ने के आसार हैं। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने दोनों सदस्यों के राजनीतिक कदम पर आपत्ति जताते हुए उनकी विधान परिषद सदस्यता समाप्त करने की मांग उठाई है।
राजद ने इस मामले को दल-बदल विरोधी कानून से जोड़ते हुए कहा है कि निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतने के बाद किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण करने पर संवैधानिक प्रावधान लागू हो सकते हैं। पार्टी चाहती है कि पूरे मामले की कानूनी और संवैधानिक स्थिति की जांच की जाए तथा नियमों के अनुसार कार्रवाई हो।
राजद ने उठाया दल-बदल विरोधी कानून का मुद्दा
राजद का तर्क है कि निर्दलीय निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होने को लेकर संविधान में स्पष्ट प्रावधान मौजूद हैं। इसी आधार पर पार्टी ने दोनों विधान पार्षदों के भाजपा से जुड़ने के घटनाक्रम पर सवाल उठाए हैं।
विपक्ष की मांग है कि संबंधित सदस्यों के राजनीतिक कदम और उनकी सदस्यता से जुड़े तथ्यों की जांच की जाए। राजद का मानना है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों को राजनीतिक दल से जुड़ने के मामले में संवैधानिक नियमों का पालन करना आवश्यक है।
हालांकि, फिलहाल इस मामले में अंतिम संवैधानिक या कानूनी फैसला सामने आने की जानकारी नहीं दी गई है। इसलिए सदस्यता समाप्त होने को तय परिणाम के रूप में नहीं देखा जा सकता।
संविधान की दसवीं अनुसूची में क्या है प्रावधान?
भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची में दल-बदल के आधार पर सांसदों और विधायकों की अयोग्यता से जुड़े नियम दिए गए हैं। इसके तहत निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित सदस्य यदि चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है, तो वह अयोग्यता के दायरे में आ सकता है।
इस प्रावधान का उद्देश्य निर्वाचित प्रतिनिधियों के चुनावी जनादेश और राजनीतिक दल बदलने से जुड़े मामलों को नियंत्रित करना है। निर्दलीय सदस्य के मामले में राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।
हालांकि, किसी सदस्य की अयोग्यता अपने आप घोषित नहीं हो जाती। इसके लिए संबंधित सदस्य की स्थिति, दल की औपचारिक सदस्यता, घटनाक्रम से जुड़े दस्तावेज और संविधान के प्रावधानों के आधार पर प्रक्रिया अपनाई जाती है।
सदस्यता पर फैसले में पीठासीन अधिकारी की भूमिका अहम
दल-बदल से जुड़े मामलों में संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। विधान परिषद के मामले में सभापति के समक्ष अयोग्यता से संबंधित याचिका या शिकायत आने पर उसके तथ्यों और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर विचार किया जा सकता है।
इस दौरान यह देखा जाता है कि संबंधित सदस्य ने वास्तव में किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण की है या नहीं और क्या उसका कदम संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता का आधार बनता है।
इसलिए केवल राजनीतिक आरोप या किसी दल की मांग के आधार पर सदस्यता समाप्त नहीं मानी जा सकती। अंतिम स्थिति संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया और सक्षम प्राधिकारी के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगी।
सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच बढ़ सकती है राजनीतिक बयानबाजी
दो निर्दलीय विधान पार्षदों के भाजपा से जुड़ने का मामला अब बिहार की राजनीति में नए विवाद का कारण बन गया है। राजद की ओर से सदस्यता समाप्त करने की मांग उठाए जाने के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी तेज होने की संभावना है।
विपक्ष इस घटनाक्रम को दल-बदल विरोधी कानून के उल्लंघन से जोड़कर देख रहा है। वहीं, पूरे मामले का वास्तविक कानूनी आधार संबंधित तथ्यों और आधिकारिक प्रक्रिया के सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा
